निर्देशक की सामन्ती कुर्सी और लेखक का समाजवादी लैपटॉप (part 3)

मुझे याद है हमारे शहर में एक खिलाड़ी सिंह थे …कोयले के माफिया ..बड़ा बंगला .अनगिनत गाड़ियाँ और ट्रक …..विधानसभा में जाकर डकार लेने वाले ..हमारे इलाके का हर नौजवान वैसा ही बनना चाहता था ….जाने अनजाने वो हमारे समाज का नायक बन बैठा था ..कोई जयप्रकाश नारायण नहीं बनना चाहता था …न ही कोई चाँद पर जाना चाहता था …सिनेमा  हमारे समाज में जो मायावी लोक की रचना करता है खिलाड़ी सिंह उसी की उपज थे…….

सिनेमा में निर्देशक विलेन  या बुरे किरदारों को justify  करने के लिए उन्हें इतना  विश्वसनीय बना देते हैं कि  दर्शक उसे स्वीकार कर लेते हैं …..उदाहरण के लिए दर्शकों के बीच गंगाजल के सुंदर यादव का क्रेज़ ईमानदार एस पी से ज्यादा हो जाता है  और उसी तरह  भीखू म्हात्रे नए नायक  बनकर उभरते हैं …..”द्रोहकाल” के  आशीष विद्यार्थी को भी उस सूची में रख सकते हैं।
सिनेमा के नायक और विलेन तो आप गढ़ लेते हैं लेकिन आप तब क्या करेंगे जब  नायक न हीरो है न विलेन है … जब वो सिर्फ एक आम आदमी है तो ?
फिर मैंने ऐसे फिल्मो के बारे में सोचा जिस का मुख्य नायक ऐसा ही एक आम आदमी हो और जिसका किरदार  किसी स्टार ने नहीं बल्कि किसी दमदार एक्टर ने निभाया  हो …….

“मैं मेरी पत्नी और वो ” का नायक खुद से ही उलझता रहता है  और आदमी के भीतर जितने डर होते हैं उन सब डरों के बगैर उस किरदार की कल्पना नहीं की जा सकती। वो इन सब डर  से छुटकारा पाने की कोशिश करता है तंत्र मन्त्र का भी सहारा ले लेता है …कुछ कास्टिंग्स बैंग ऑन होते हैं।

कई बार आपको अच्छे एक्टर्स चाहिए होते हैं कई बार कुछ फिल्मकार  नॉन एक्टर्स को कास्ट करते हैं जैसे “सिटी ऑफ़ गॉड” …बहुत ज़ुरूरी हो जाता है कि आप एक अच्छा एक्टर ले रहे या जो नायक आपने रचा  है उसे निभाने वाला एक साधारण एक्टर  या नॉन एक्टर है  …

अनुराग कश्यप की “द लास्ट ट्रेन टू  महाकाली” का के के  ….या श्रीराम राघवन की फिल्म “रमन  राघव” के रघुवीर यादव ….ये दोनों किरदार नेगेटिव कैरक्टेर्स हैं ….दोनों के नायक स्थितियों में पड़कर विलेन लगने लगते हैं …यहाँ सबसे बड़ी समस्या किसी फिल्मकार के साथ ये होती है कि ऐसे शेड्स वाले किरदारों को कौन इतनी मासूमियत से जी ले कि  दर्शक उसके तमाम बुरे कामो के बाद भी उससे घृणा न करे।

“रमन  राघव” का नायक  बेरहमी से लोगों  को मार डालता है लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद आप उस शून्य में चले जाते हैं जहाँ सही ग़लत ……अच्छा बुरा जैसे  शब्दों पर आप दोबारा  मंथन करने लगते हैं …

एक निर्देशक के रूप में जब आप कास्टिंग करने बैठते हैं तो आप समझदार तरीके से अच्छे  एक्टर्स लेते हैं …लेकिन अच्छे एक्टरों के साथ समस्या ये है कि  वो बहुत अच्छी एक्टिंग कर देते हैं .ज़ाहिर है एक निर्देशक को और क्या चाहिए लेकिन कभी कभी लगता है कि शायद आपको उतने अच्छे एक्टिंग की ज़ुरूरत नहीं है ……
मेरे लिए चुनौती भरा प्रश्न यही था “पेंटर” का किरदार कौन कर सकता है ..मुझे एक कच्चा एक्टर चाहिए था …मेरे पास फिल्म स्कूल  से निकले कलाकारों के आप्शन थे लेकिन मैंने सोचा कि  ज़रा रिस्क लिया जाए और थोड़े बगैर ठप्पे वाले एक्टर्स के साथ काम किया जाए ….

“राजू पेंटर ” का  पेंटर उस मजदूर तबके से है जो अपने पसीने की कमाई  खाता है और ऐसे तबके के किरदार  काम करने के बाद बीडी फूंकते  हैं।ताश खेलते हैं मस्त रहते हैं  और एक ख़ास किस्म का आलस होता हैं इनके भीतर …इन्हें कोई ताश खेलते हुए देखे तो कह न सके की इन्होने दिन भर हाड तोड़ मेहनत  की हैं ….इतने ज्यादा वे अपने वर्तमान में मशगूल रहते हैं  ……. इनके चेहरों के भाव भी ज्यादातर  एक्सप्रेशनलेस  ही होते हैं …

.निशांत में मुझे वो किरदार दिखा। जो बकचोदी में चैंपियन है लेकिन उससे आप चाय बनवा ले तो वो काम भी वो किसी को ओउट्सोर्स कर देता है ……………मुझे उसका ये अंदाज़  “पेंटर” के लिए अनुकूल लगा। निशांत ने जेएनयु से थिएटर किया है और बिहार के बेगुसराय  का रहने वाला है

..चूँकि  “पेंटर” भी बिहार से आया हुआ एक माइग्रेंट मजदूर  है तो मुझे उसके  बैकग्राउंड से काफी मदद मिली …उसके हाव भाव और ज़बान में वहां की ज़मीन महकती है … ..उसकी ख़ास बात   है कि वो  बहुत ज्यादा एक्सप्रेशन नहीं देता है और खाली सपाट चेहरे मुझे हमेशा से आकर्षित करते हैं ……..सिर्फ समस्या उसके नाक की है जो जरूरत से ज्यादा बड़ी है और  मैं अक्सर उसे कहा करता हूँ कि  “तुम अपनी नाक कटवा लो” जो स्वाभाविक रूप से उसे पसंद नहीं आता …
निशांत के पास बाइक  है और उन लोगों में से है जो चाय भी पीने जाते हैं  तो बाईक  से लेकिन जिस दिन मैंने उसकी फायनल कास्टिंग कि और कहा कि राजू पेंटर का” पेंटर” पूरे शहर में साइकिल से चलता है तो उसके अगले दिन से वो अपनी बाइक  छोड़कर साइकिल में घूमने लगा … …….

मुझे लगता था कि  निशांत का  लेड बैक तेवर  कहीं किरदार के दुसरे पहलुओं को प्रभावित न कर दे लेकिन  मेरी आशंकाओं के विपरीत वो किसी भी राह चलते आदमी के साथ बतियाने लगता या बीडी पीने लगता और मुझे पता ही नहीं चला कि कब वो पेंटर के किरदार में  ढलता चला गया।
मैंने उसे मजीदी की “बरन” दिखाई ….जो मजीदी की सबसे कम प्रचलित फिल्मो से है लेकिन इस फिल्म का मौन मुझे बहुत प्रभावित करता है और उसके मुख्य किरदार का हावभाव …..मुझे नहीं पता मेरे दिखाने का निशांत पर कोई प्रभाव पड़ा या नहीं ..शायद नहीं पड़ा क्योंकि मुझे “पेंटर” में उसकी छाया कहीं नहीं दिखी लेकिन अप्रत्यक्ष  रूप से उसेक ठहराव पर छौंक लग चुकी थी जो मेरे लिए उस किरदार के लिए बहुत ज़रूरी था ….
“राजू पेंटर “की अगली चुनौती ती थी  prostitute  की कास्टिंग। जिन दिनों मैं रानी से मिला उन दिनों वो  डायरेक्शन के फील्ड में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रही थी …एन डी टी वी में काम कर चुकी रानी अंग्रेजी बैकग्राउंड से है जो  “फक ऑफ” या mothefucker  तो काफी आसानी से बोल लेती है लेकिन “मादरचोद ” या उस सेंस में “भोंसड़ी  ” के भी नहीं बोल पाती थी।

ज़ाहिर था मेहनत  करनी पड़ी और रानी ने अपनी पर्सनालिटी के खिलाफ जाकर वो बॉडी लैंग्वेज पकड़ी और जब उसने शॉट दिया तो मैं अचंभित था कि इतनी आसानी से उसने कैसे तैयारी कर ली। मुझे लगता है रानी  का जर्नालिजम बैकग्राउंड और उस के भीतर की औरत और उसकी अपनी सामाजिक राजनीतिक समझ ने शायद “फुलझड़ी ” के किरदार को गढ़ने में मदद दी होगी ….

एक prostitute  के बारे में बताते हुए मुझे थोडा अजीब तो लगता था और कई बार लगता था की मैं सिनेमा के नाम पर किसी को offend  तो नहीं कर रहा लेकिन रानी ने हमेशा मुझे cooperate  किया …और हमारे बीच काफी ओपन कन्वर्सेशन होता था जिससे जिस तरह का किरदार मैं चाहता था उसके करीब हम पहुँच सके ..मुझे लगता है संवादहीनता की स्थिति किसी भी फिल्म के लिए काफी घातक है …
फिल्म में एक छक्के  का भी किरदार है ….ये किरदार मुंबई के  पॉश लोखंडवाला में आधी रात के बाद जन्मने वाले देह मंडी से हुआ …यहाँ सड़क के किनारे ज्यादातर छक्के खड़े रहते हैं ..उनकी खासियत ये है की वो मॉडर्न कपडे पहनते हैं और दिखने में बहुत खूबसूरत होते हैं और एक पल के लिए आप इन्हें खूबसूरत लड़कियां  समझने का धोखा भी खा सकते हैं ..

आधी रात  के बाद यहाँ महंगी  गाड़ियाँ रूकती है और उन्हें बिठाकर ले जाती है …कई बार हमने दारु के नशे में इनसे बातें की हैं …ज़िन्दगी से बढ़कर और कोई किताब नहीं होती …इनसे मिलकर पहली बार लगा की छक्के सिर्फ ताली बजाने और गंदे कपडे पहनने के लिए पैदा नहीं हुए हैं …शायद वो लोखंडवाला के अभिजात्य से कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं  …..

फिल्म में जो किरदार था उसके पास बोलने के लिए संवाद  नहीं थे   ….इसके लिए वासिल को मैंने चुना जो बहुत ही खूबसूरत लड़का है और जिसने सहारनपुर से थिएटर किया है ….और उसने बखूबी बगैर किसी संवाद के वो किरदार निभाया ..

यहाँ मैं इस फिल्म के  एक्टर्स वर्कशॉप कराने वाले रजनीश बिष्ट का जिक्र करना चाहूँगा जिन्होंने इन एक्टर्स को तैयार करने में अपनी एहम भूमिका निभाई ..उन्होंने इन एक्टर्स के भीतर जो भी शरीफ और सभ्य  इंसान बैठा था उसे अलग अलग एक्सरसाइज करवा कर बाहर निकाला ….रजनीश के बारे में मशहूर है की वे जरा भी नॉनसेंस बर्दाश्त नहीं करते लेकिन उसके उलट उन्होंने  हलके और प्यारे माहौल में ये वर्कशॉप कंडक्ट किया ….रजनीश राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए अलग अलग राज्यों और शहरों में एक्टिंग वर्कशॉप करते हैं।

आम आदमी की ज़िन्दगी जैसा सिनेमा कोई भी नहीं है ..उसकी तकलीफें .उसके भीतर का डर …उसकी हिम्मत .उसकी हंसी ….को साधारण एक्टरों के माध्यम से जीना  या कैप्चर करना  एक दुरूह काम है लेकिन  अंत में एक आत्म संतुष्टि भी ……
बाकी के किरदारों के बताने से हो सकता है कि जिन्होंने फिल्म नहीं देखी है उनके क्लाइमेक्स को खराब करना होगा इसलिए इनके बारे में  फिर कभी ….

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निर्देशक की सामन्ती कुर्सी और लेखक का समाजवादी लैपटॉप (part 2)

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(continued from previous post)

लोग “बायसिकल थीव्स ” की बात करते हैं ..”मालेगांव के  सुपरमैन” की बात करते हैं और फिल्मो के जुनून में पगलाए रहते हैं ….सिनेमा को बदलने की बातें करते हैं पर ब्लू फिल्म की बातें कोई नहीं करता ….अभी 10 साल तक जो भी फिल्म शुरू होता था उससे पहले किसी देवी देवता की पूजा करते हुए दिखाई देते थे और सिनेमा के  परदे संस्कार बांटा करते थे  ……ज़ाहिर हैं ब्लू  फिल्में संस्कार नहीं फैलाती  तो सिनेमाई  पैशन से ही कौन सा समाज बदल रहा है .?..कौन सा नया आर्ट डिस्कवर हो रहा है  …न “दो बीघा ज़मीन” बदल सका छोटे  किसानो की हालत न “पीपली लाइव” ….फिर सिनेमा बनाने का purpose   क्या है  ? इससे अच्छा तो पंकज उधास का गाया  “चिट्ठी  आई है ” गाना था जिसे सुनने के बाद विदेशों में बसे कई हिंदुस्तानी डॉक्टर्स अपनी मिटटी……. अपने वतन लौट आये थे ….

फिर सिनेमा का ये स्वांग क्यों ?…क्या इतनी बेहतरीन फिल्मो के बावजूद ईरान  में रह रही औरतों के सामाजिक अस्तित्व में कोई सुधार आया है … और ये बहस बहुत पुरानी हो चुकी है की हम कुछ बदलने के लिए सिनेमा नहीं बना रहे ….हम सिर्फ दर्शकों के दिमागी नसों में थोड़ी हलचल पैदा करना चाह रहे  बस इससे ज्यादा सिनेमा कुछ कर नहीं सकता ..चश्मा साफ़ करें तो दिख जाएगा की लोग सिनेमा के नाम पर क्या बना रहे हैं .

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“स्लमडॉग”  की रुबीना की झोपडी उजाड़ दी गयी किसी “प्रतीक्षा’ या “मन्नत” से न कोई हिंदी का शब्द निकला न कोई उर्दू का ….Progressive aur realistic  फिल्मो का हम कितना  भी  दावा करें  लेकिन ये हकीक़त है कि सिनेमा बांद्रा ईस्ट  की बस्तियों में जाकर  ख़त्म हो जाता है …..और काला  सच ये भी की ज़फर पनाही जैसे लोग अन्दर होते हैं …मलयालम फ़िल्मकार जॉन अब्राहम ख़ुदकुशी कर लेता है …..लेकिन रामगोपाल वर्मा और महेश भट्ट (समकालीन परिदृश्य में )जैसे लोग फिल्मे बनाते रहते हैं। कुल मिलाकर बात सिर्फ इतनी है की सिनेमा को बदलने की कोशिश न की जाये उसकी जगह पर  नंगे होने के जतन किये जाएँ  …
मैंने भी “राजू पेंटर” बनाने की कोशिश नहीं की , बस अपने ऊपर थोपे गए सभ्यता की खाल उतारने की कोशिश की है ….”राजू पेंटर” जैसी कहानी का जन्म उन गंदे नाले के पुलों के ऊपर लिखे “नामर्द रोगी तुरंत मिले ” हकीम उस्मानी से …या “यहाँ पेशाब करना मना है ” जैसे सस्ते और हिकारत की दृष्टि से देखे जाने वाले  इबारतों को देखकर हुआ …मैं अक्सर सोचता था कि  इसे लिखने वाला आदमी कौन होगा ?……

मैं उसे ढूंढता रहा  और जिस दिन मैंने उसे देखा  उस दिन एक और अजीब बात हुई।  उस पेंटर ने दीवार पर लिखा और काम ख़तम कर अपनी ही लिखी हुई पेंटिंग के नीचे पेशाब कर के  चल दिया ……मैंने सोचा कि  ये कैसा काम है जिसमे लिटरली “अपने किये धरे पर मूतना है” ….ऐसे लोग किस मिटटी के बने होते हैं ……..पखाने से लबलबाते पखाने घरों  में इन्हें हगते हुए इन्हें कोई घिन नहीं आती ?
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इस मामले में ये लोग उन  सिद्ध ऋषियों की तरह लगते हैं जो जीवन के जंजालों  से ऊपर उठ चुके हैं ……. ऐसे किरदार क्या किसी फिल्म का मुख्य पात्र यानी प्रोटागोनिस्ट हो सकता है ?…मैंने सोचा कि “Ameros Perros ” का वो मार्क्स की याद दिलाता कुत्तों के साथ रहने वाला कचरा उठाने वाला आदमी जब  फिल्म की धुरी बन सकता है (बाद में भले ही वो मध्य वर्ग का नागरिक निकले ) तो ऐसा दीवार रंगने वाला आदमी एक फिल्म का नायक क्यों नहीं हो सकता … और यहीं से शुरू हुआ उस किरदार को रचने का सिलसिला और उसके पास की कहानियों का  समेटने और समझने के बाद बन गयी कहानी “राजू पेंटर ” की।
तो कहानी का नायक एक माइग्रेंट लेबर है जो बिहार के मधुबनी से है और जिसकी हड्डियों में मिथिला की लोक कला बसती है लेकिन पेट हर कला को पीछे छोड़ देती है और अब इसका रोना बेवकूफी है कि लोक कलाएं कहाँ और किसने हथिया ली है ?
 शहर कला की मंडी लगाता है  ……मुंबई भी कला का तारणहार बनने की कोशिश करती है  जहाँ ग्राफिटी एक आर्ट में कूल है लेकिन वारली पेंटिंग्स या मिथिला की पेंटिंग्स उस तरह से “कूल” नहीं बन पाती ……मछलियों , राजाओं , सोहर और बिदाई  गीत की संरक्षक जनक की धरती मिथला की पेंटिंग्स दिल्ली हाटों और हस्तशिल्प में हज़ारों  में  हैं लेकिन आम जनता से दूर हैं  ….और इसलिए ये पेंटिंग्स किसी  बढही के या किसी स्वीपर के घर पर नहीं दिखती  ..ये कला बंगलों में जाकर क़ैद हो गयी है ….अब किसने क़ैद किया क्यों किया ..ये एक राजनीतिक  बहस है जिसका   भोली जनता और  दलालों के इस देश   में कोई मतलब नहीं।  बहरहाल कहानी आगे बढी।

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एक लेखक कभी भी कुछ लिखता नहीं है …वो सिर्फ रियेक्ट करता है  …पाठकों के लिए लिखता है तब भी और प्रोडूसर के फीडबैक के बाद भी दरअसल वो रिएक्ट  ही कर रहा होता है …

“गोदान’ और “राग दरबारी” या “आधा गाँव”  अपने अपने समय और समाज पर कमेन्ट  है ..इन कहानियों को आप उनके समय से अलग नहीं कर सकते ….मंटो इसके  सबसे धारदार उदाहरण है .मंटो ने वही लिखा जो नंग सच उसने देखा। उसने भी दर असल रिएक्ट  ही किया था …विभूतिभूषण बदोपध्याय की कहानियों को ही सत्यजीत रे क्यों उठाते रहे ..क्योंकि वो सबसे ज्यादा प्रतिक्रियात्मक थे  ….मार्टिन स्कोर्सिसी  भी “टैक्सी ड्राईवर” के माध्यम  से नीयन रौशनी से जगमगाते न्यूयार्क की खाल उतारते रहे …. …किम की दुक की कहानियां किसी फंतासी दुनिया में रची जाती है लेकिन वो दरअसल वो रिएक्शन इसी भौगोलिक दुनिया पर है  ..

एक निर्देशक उस रिएक्शन को  कई .गांठों में बाँध देता है और सब कुछ रहस्यमयी लगता है ..दर्शक उन गांठों को एक एक कर खोलते रहते हैं और सिनेमा का जादू असर करने लगता है …..

“राजू पेंटर” लिखते हुए मैं  भी  रिएक्ट ही कर रहा था … वादों पर रिएक्ट कर रहा था ….सपनो पर रिएक्ट कर रहा था ..विचारधाराओं पर रिएक्ट कर रहा था …….वो कौन थे जो बराबरी का सपना दिखाते रहे  और अपने गमलो में फूल सजाते रहे और खर  पतवारों को सडकों …दुर्गन्ध मारती गलियों और  बीमारियाँ पालते गंदे नालों में उठाकर  फेंकते रहे…….

एक लेखक और निर्देशक होने के कारण “राजू पेंटर” के कई गाँठ मैंने खुद लगाये हैं और कुछ  खुले छोड़ दिए हैं …
आगे की बातें अगले पोस्ट में जहाँ हम बातें करेंगे शूटिंग की और हमारे कलाकारों और टेक्नीशियन्स की

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आगे की बातें अगले पोस्ट में जहाँ हम बातें करेंगे शूटिंग की और हमारे कलाकारों और टेक्नीशियन्स की

(to be continued….)

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